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न्यूयॉर्क में बोले मोहन भागवत: जो हिंदू मुसलमानों को भारत से बाहर निकालना चाहता है, वह हिंदू नहीं रहेगा
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने शनिवार को न्यूयोर्क में एक सम्मेलन में कहा कि जो हिंदू यह मानता है कि मुसलमानों को भारत से "बाहर निकाला जाना चाहिए", वह हिंदू नहीं रह सकता. उन्होंने तर्क दिया कि मानवता की एकता की हिंदू अवधारणा में इस तरह के बहिष्कार के लिए कोई स्थान नहीं है.
अहेड (एएचईएडी) फोरम द्वारा आयोजित 'फेथ लीडर्स कॉन्फ्रेंस' को संबोधित करते हुए—जिसमें ईसाई, यहूदी, हिंदू और इस्लाम धर्म के वक्ता शामिल हुए थे—भागवत ने कहा कि सामाजिक-धार्मिक संगठन सार्वजनिक नीति और राजनीति को प्रभावित करना चाह सकते हैं, लेकिन उनका काम समाज से शुरू होना चाहिए क्योंकि "राजनीति अब स्वार्थ का खेल बन गई है."
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लॉन्च के दो महीने बाद भी वीबी-ग्राम जी के तहत 57 लाख सक्रिय श्रमिकों को ई-केवाईसी का इंतज़ार : रिपोर्ट
‘द हिंदू’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) का स्थान लेने वाली नई ग्रामीण रोजगार योजना ‘विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ (वीबी-ग्राम जी) के लॉन्च के दो महीने बाद भी लगभग 57 लाख सक्रिय श्रमिक ई-केवाईसी सत्यापन का इंतजार कर रहे हैं.
9 अगस्त, 2026 तक के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, जुलाई 2026 में वीबी-ग्राम जी योजना के तहत केवल 7.67 करोड़ मानव-दिवस सृजित किए गए, जो पिछले साल इसी महीने में मनरेगा के तहत सृजित 15.33 करोड़ मानव-दिवस की तुलना में 49.94% कम थे. मानव-दिवस माप की एक इकाई है, जो एक कार्य दिवस में एक व्यक्ति द्वारा किए गए कार्य की मात्रा पर आधारित होती है.
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श्रवण गर्ग | भागवत की अमेरिका यात्रा के पीछे कोई बड़ा राजनीतिक मकसद हो सकता है
‘हरकारा डीप डाइव’ के इस एपिसोड में निधीश त्यागी ने वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा के राजनीतिक मायनों पर विस्तार से चर्चा की. बातचीत का केंद्र सिर्फ न्यूयॉर्क के मेडिसन स्क्वायर गार्डन में होने वाला उनका कार्यक्रम नहीं, बल्कि यह सवाल रहा कि आखिर भारत के लिए इतने महत्वपूर्ण राजनीतिक और कूटनीतिक समय में मोहन भागवत अमेरिका क्यों गए हैं?
श्रवण गर्ग ने सबसे पहले इस दावे पर सवाल उठाया कि मोहन भागवत के कार्यक्रम का अमेरिका में जबरदस्त विरोध हो रहा है. उनका कहना था कि कुछ मानवाधिकार संगठनों के विरोध को जरूरत से ज्यादा प्रचारित किया जा रहा है, जबकि बड़ी संख्या में हिंदू-अमेरिकी संगठन इस कार्यक्रम के समर्थन में भी खड़े हैं. उनके मुताबिक, असली सवाल विरोध और समर्थन करने वाले संगठनों की संख्या नहीं, बल्कि मोहन भागवत की इस यात्रा के पीछे छिपे राजनीतिक संकेत हैं.
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अग्निपथ 2.0 की जरूरत: भारत को सस्ती सेना चाहिए, सस्ता सैनिक नहीं
‘द प्रिंट’ में प्रकाशित पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल एच. एस. पनाग के लेख में अग्निपथ योजना में व्यापक सुधार की जरूरत पर जोर दिया गया है. अग्निपथ के तहत भर्ती होने वाले पहले अग्निवीर अब चार साल की सेवा पूरी करने के करीब हैं. नौसेना का पहला बैच इस साल के अंत तक अपना कार्यकाल पूरा करेगा, जबकि सेना और वायुसेना के बैच अगले साल अपने निर्धारित कार्यकाल के अंतिम चरण में पहुंचेंगे. ऐसे में यह योजना की पहली वास्तविक परीक्षा मानी जा रही है.
सरकार के सामने चुनौती यह है कि न तो अग्निपथ 1.0 को बिना बदलाव के सही मानकर उसका बचाव किया जाए और न ही राजनीतिक दबाव में इसे पूरी तरह खत्म कर दिया जाए. जरूरत एक व्यापक रूप से संशोधित "अग्निपथ 2.0" की है, जो आर्थिक जरूरतों के साथ सैन्य क्षमता और सैनिकों के हितों के बीच संतुलन बनाए.
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भवानी शंकर नायक | उल्टा रॉबिन हुड: मोदी सरकार कैसे कॉरपोरेट्स को खिलाती और देश को भूखा रखती है
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की हिंदुत्ववादी सरकार ने अपने 12 वर्षों के शासन में "हिंदू राष्ट्र" की अपनी वास्तविक प्रकृति को उजागर कर दिया है. दुनिया में शायद ही कोई ऐसी सरकार हो जो भारत में मोदी सरकार की तरह इतनी तेजी से कॉरपोरेट कर्जों को बट्टे खाते में डालती हो.
हाल ही में राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण यानी एनसीएलटी ने एस्सेल ग्रुप ऑफ कंपनीज और उसके चेयरमैन श्री सुभाष चंद्र के लिए करीब 6.5 करोड़ रुपये की पुनर्भुगतान योजना को मंजूरी दी. यह मंजूरी लगभग 22,006.57 करोड़ रुपये के स्वीकृत ऋणदाता दावों के मुकाबले दी गई. इसका अर्थ है कि 1,260 से अधिक लेनदारों को अपने लगभग 99.97 प्रतिशत धन का नुकसान उठाना पड़ सकता है.
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अपूर्वानंद | आरक्षण की बहस, जंतर-मंतर और हिंदुत्व की राजनीति का नया संकट
'हकारा डीप डाइव' के इस लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने प्रोफेसर अपूर्वानंद के साथ आरक्षण के खिलाफ उभरते आंदोलन, यूजीसी के भेदभाव-विरोधी नियमों और इसके पीछे दिखाई दे रही राजनीतिक रणनीति पर चर्चा की. बातचीत का केंद्रीय सवाल था कि क्या परीक्षा व्यवस्था और युवाओं के अवसरों के संकट से शुरू हुई बहस को अब आरक्षण की ओर मोड़ने की कोशिश हो रही है.
प्रोफेसर अपूर्वानंद ने जुलाई में जंतर-मंतर पर परीक्षा प्रणाली और खासकर नीट से जुड़े सवालों को लेकर हुए युवा जमावड़े का जिक्र किया. उनके मुताबिक उस आंदोलन का मूल सवाल अवसरों की निष्पक्षता और परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता था. लेकिन बाद में आरक्षण के खिलाफ एक अलग राजनीतिक विमर्श उभरता दिखाई दिया.
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'दिमागी नक्सल'? आज के दौर में वेद और उपनिषद के ऋषि भी इस श्रेणी में आते
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल में "दिमागी नक्सल" शब्द का इस्तेमाल उन लोगों के लिए किया, जिनके विचार सरकार की राजनीतिक दिशा पर सवाल उठाते हैं. स्क्रोल में तुहिन भट्टाचार्य इस शब्द के जरिए एक दिलचस्प सवाल उठाते हैं. अगर सत्ता पर सवाल उठाना ही "दिमागी नक्सल" होने की पहचान है, तो वेद और उपनिषद की रचना करने वाले ऋषि भी आज के दौर में इसी श्रेणी में रखे जा सकते हैं.
लेखक का तर्क है कि हिंदुत्व की राजनीति अक्सर वेदों और उपनिषदों को अपनी वैचारिक परंपरा के स्रोत के रूप में पेश करती है. लेकिन इन प्राचीन ग्रंथों को गंभीरता से पढ़ने पर एक ऐसी परंपरा सामने आती है, जिसमें सवाल, बहस, संशय और सत्ता की आलोचना के लिए पर्याप्त जगह है.
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सुशांत सिंह | ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का कमियों से भरा विवरण, परमाणु तनाव बढ़ने के जोखिमों को उजागर करता है
‘द कारवां’ में प्रकाशित सुशांत सिंह का यह लेख पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल अनिल चौहान द्वारा 'ऑपरेशन सिंदूर' (मई 2025 का भारत-पाकिस्तान संघर्ष) पर दिए गए व्याख्यान का आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है. 25 अगस्त 2026 को आरएसएस से जुड़े 'विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन' में बोलते हुए जनरल चौहान ने सरकार के आधिकारिक आख्यान को दोहराया कि यह भारत द्वारा जीती गई एक सीमित, 'गैर-संपर्क' सैन्य कार्रवाई थी. हालांकि, लेखक के अनुसार इस दावे में कई गंभीर कमियां और विरोधाभास हैं.
जनरल चौहान के अनुसार, प्रारंभिक योजना अभियानों को केवल ड्रोन, लोइटरिंग म्यूनिशन और तोपखाने तक सीमित रखने की थी. लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा बड़े कदम की मांग और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा जैश-ए-मोहम्मद के बहावलपुर मुख्यालय को लक्ष्य बनाने के निर्देश के बाद भारतीय वायु सेना को शामिल करना पड़ा.
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आसिम अली | साझा कमियां
‘द टेलीग्राफ’ में आसिम अली का यह लेख भारत की वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था, सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के प्रभुत्व के कारणों और विपक्षी दलों की वैचारिक तथा नीतिगत विफलताओं का गहन विश्लेषण करता है.
लेखक का मानना है कि देश वर्तमान में एक 'लोकतांत्रिक वसंत' का साक्षी बन रहा है. दार्शनिक कॉर्नेलियस कास्टोरियाडिस के अनुसार, लोकतंत्र की आत्मा मौजूदा संस्थागत व्यवस्था पर मौलिक सवाल उठाने में निहित है. पिछले दशक में किसानों, श्रमिकों, आदिवासियों, मुसलमानों और दलितों के आंदोलनों के माध्यम से यह भावना प्रकट हुई है. विशेष रूप से, जंतर-मंतर से शुरू होकर सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की मांग करने वाले जनरेशन-ज़ेड (जेन-ज़ी) और युवाओं के विकेंद्रीकृत आंदोलन ने शिक्षा प्रणाली के खिलाफ एक व्यापक सामाजिक गठबंधन खड़ा किया है.
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भारत में हर 3 में से 1 जेन जी युवा काम से बाहर. वजह सिर्फ कौशल की कमी नहीं
भारत की युवा आबादी को अक्सर देश की सबसे बड़ी ताकत बताया जाता है. लेकिन रोजगार और शिक्षा से जुड़े आंकड़े एक अलग तस्वीर पेश करते हैं. ‘द क्विंट’ में प्रकाशित अपने लेख में औनिंद्यो चक्रवर्ती ने सरकारी आंकड़ों और श्रम सर्वेक्षणों के आधार पर सवाल उठाया है कि आखिर भारत की जेन जी पीढ़ी का बड़ा हिस्सा शिक्षा, प्रशिक्षण और रोजगार से बाहर क्यों है. उनका तर्क है कि समस्या केवल युवाओं के पास कौशल की कमी की नहीं, बल्कि रोजगार के सीमित अवसरों, सामाजिक बाधाओं और खासकर महिलाओं के खिलाफ मौजूद संरचनात्मक भेदभाव की भी है.
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नवी मुंबई में 3,400 एसआईआर फॉर्म की फोटोकॉपी करते भाजपा कार्यकर्ता पकड़ा गया; 5 बीएलओ निलंबित
‘द हिंदू’ ब्यूरो के अनुसार, नवी मुंबई की एक दुकान में गुरुवार (27 अगस्त, 2026) को एक स्थानीय भाजपा कार्यकर्ता को मतदाताओं के विवरण वाले 3,400 से अधिक विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) चुनावी फॉर्म की फोटोकॉपी करते हुए पकड़े जाने के बाद पांच बूथ-स्तरीय अधिकारियों (बीएलओ) को निलंबित कर दिया गया है.
खारघर पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि 28 अगस्त की सुबह मामला दर्ज किया गया. जिला कलेक्टर किशन जावले के अनुसार, चुनावी पंजीकरण कार्यालय को एक शिकायत मिली थी कि आरोपी सूरज पाटिल एसआईआर फॉर्म की फोटोकॉपी करवा रहा था.
टीका - टिप्पणियां | विश्लेषण | लेख
'द इंडियन एक्सप्रेस' में दीप्तिमान तिवारी की रिपोर्ट: न्यूयॉर्क में बोले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत, 'जो मुसलमानों को बाहर निकालने की बात करे वह हिंदू नहीं रह सकता'; सामाजिक एकता और राजनीति पर बड़ा बयान.
'द हिंदू' की रिपोर्ट: मनरेगा की जगह आई नई 'वीबी-ग्राम जी' योजना के दो महीने बाद भी 57 लाख ग्रामीण मजदूर e-KYC के इंतजार में अटकलों और रोजगार संकट से परेशान.
'हरकारा डीप डाइव': निधीश त्यागी और श्रवण गर्ग की बातचीत; मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा के राजनीतिक मायने, संघ के वैश्विक नेटवर्क और भारत-अमेरिका संबंधों पर विश्लेषण.
'द प्रिंट' में पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल एच. एस. पनाग का विश्लेषण: 4 साल बाद अग्निपथ योजना की कमियां, 'अग्निपथ 2.0' की जरूरत और सैनिकों के वेतन-रिटेंशन पर विस्तृत रिपोर्ट.
'काउंटरकरंट्स' में भवानी शंकर नायक का विश्लेषण: एस्सेल ग्रुप के कर्ज माफी मामले, कॉरपोरेट लोन राइट-ऑफ और हिंदुत्ववादी आर्थिक मॉडल पर एक विस्तृत रिपोर्ट.
'हकारा डीप डाइव': निधीश त्यागी और प्रो. अपूर्वानंद की बातचीत; यूजीसी नियम, आरक्षण विरोधी आंदोलन और हिंदुत्व की राजनीति के आंतरिक विरोधाभासों पर विस्तृत रिपोर्ट.
'स्क्रोल' में तुहिन भट्टाचार्य का लेख: "दिमागी नक्सल" बहस, वेदों-उपनिषदों में सवाल पूछने की वैदिक परंपरा और मौजूदा राजनीति पर एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट.
'द कारवां' में सुशांत सिंह का विश्लेषण: 'ऑपरेशन सिंदूर' पर पूर्व CDS जनरल अनिल चौहान के दावों की समीक्षा, लड़ाकू विमानों के नुकसान और चीन-पाक सैन्य साठगांठ पर विस्तृत रिपोर्ट.
वीडियो
निधीश त्यागी के साथ जुड़ें सुरभि गुप्ता और जानिए न्यूयॉर्क से लेकर मोहन भागवत से जुड़े अहम घटनाक्रमों और उनके राजनीतिक-सामाजिक संदर्भों तक की पूरी तस्वीर. लाइव चर्चा में इन मुद्दों की परतों को खोलने की कोशिश होगी और समझेंगे कि इन घटनाक्रमों का देश-दुनिया की राजनीति और समाज पर क्या असर पड़ सकता है. देखिए हरकारा डीप डाइव लाइव.
हरकारा डीप डाइव के इस लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने लेखक, पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता आकार पटेल के साथ न्यूयॉर्क में मोहन भागवत के कार्यक्रम और उसके विरोध पर चर्चा की. क्या न्यूयॉर्क में आरएसएस और हिंदुत्व की राजनीति के सामने एक दूसरा, बहुलतावादी और समावेशी भारत खड़ा है? प्रवासी भारतीय, जोरान ममदानी, भारत की ग्लोबल इमेज और मोहन भागवत के ग्लोबल आउटरीच पर देखिए पूरी बातचीत.
हम हरकारा.
हरकारा एक देशज शब्द है संदेशवाहक के लिए.हमारी यह एक छोटी सी कोशिश है कि वे ज़रूरी ख़बरें आप तक पहुँचाई जाएँ, जो अक्सर नज़रअंदाज़ हो जाती हैं, छिपा दी जाती हैं, या फिर इस तरह तोड़-मरोड़ कर पेश की जाती हैं कि वे भ्रम पैदा करें.
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हरकारा डीप डाइव में निधीश त्यागी के साथ प्रो. अपूर्वानंद की बातचीत में आरक्षण विरोधी आंदोलन, यूजीसी के भेदभाव विरोधी नियम, जंतर-मंतर के प्रदर्शन और इसके पीछे की राजनीति पर चर्चा. क्या युवाओं के असली सवालों से बहस को आरक्षण की ओर मोड़ा जा रहा है? हिंदुत्व की राजनीति के सामने जाति और संसाधनों के बंटवारे का नया संकट क्या है? और क्या जंतर-मंतर से उभरी सामाजिक एकता भारतीय राजनीति में नई दिशा दे सकती है? #HarkaraDeepDive #Reservation #Apoorvanand #NidheeshTyagi #Politics #UGC